शनिवार, 30 अप्रैल 2011

बाट

दूर कहीं टिमटीमाये लौ 
पथिक अकेला देख कर 
उकसाए ललचाये चटकती
पावों छिलते बेखबर मटकती 
चल चला चल तू पाने को
मंजील बन बाट जोहे जो    

3 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सुन्दर रचना।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा!

vandana gupta ने कहा…

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (2-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/