शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

धरती के बोझ

हम धरती के बोझ हैं बाबा 
हम धरती के बोझ
भ्रष्टाचारी हैं हम पक्के 
दूजी न कोई सोच बाबा

चाहे जो तुम काम बोलो 
हम करें नोटों से तोलो 
अपने रिश्ते नाते हैं सब 
बस तुम जाओ तिजोरी खोलो 
मंत्री हो या कोई संतरी 
रखे हम सबकी जंत्री 
आदेश न्यायिक पास करालो
अपना है यही काम रोज बाबा

हम धरती के बोझ

नेता हो या अभिनेता हो 
घूस न चाहे कोई लेता हो 
सोफे पर या मेज के नीचे 
पैसे रखें दांतों में भींचे 
कैसे कब किसको पकड़ें 
अपने हाथ हैं सबसे तगड़े 
काम होगा विश्वास हमारा  
कलदार पूजें रोज हम बाबा 

हम धरती के बोझ 


3 टिप्‍पणियां:

nilesh mathur ने कहा…

सच कहा, बोझ ही तो बन कर रह गए हैं हम !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हम धरती पर बोझ,
फिर काहे को सोच।

Kailash Sharma ने कहा…

सच कहा है यह भ्रष्टाचार बोझ बन कर ही रह गया है..बहुत सार्थक रचना