रविवार, 17 अप्रैल 2011

प्रिय

सावन सुखा  झुलस गया 
पतझड़ आया ठूंठ बनाया  
जेष्ठ में भीग भागी गर्मी 
पोह भाता था गुजर गया 

ऑंखें सावन पतझड़ होठ 
पोह से अंग  जेष्ठ आगोश 
बसंती उम्मीद जग खामोश 
आत्मा तरसी बदली छायी

2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बेहतरीन, प्रकृति मन की स्थिति कैसे स्पष्ट कर देती है।

Shah Nawaz ने कहा…

बहुत बढ़िया....