मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

सफर

आन्तरिक समस्याओं में जकड़ा
खड़ा हुआ एक चौराहे पर
सड़क पार करने की सोच रहा था
देखा एक लम्बी सी गाड़ी के पास
एक मैले कुचैले वस्त्रों में लिपटी
अपने दुधमुहे के मुख में स्तन
अपने अर्ध नग्न तन को लपेटती
एक नारी गरीबी का वास्ता दे रही थी
और कुछ मिलने कि चाह में
अंगो की कराहट दिखा रही थी
तभी गाड़ी का कांच नीचे
और उसमे से हाथ से कुछ इशारा हुआ
मुझे कुछ समझ न आया
पर इतनी देर में उस स्त्री को  मैंने
लाल बत्ती पार पाया
मैंने उत्सुकता वश
उस और कदम बढाया
और पाया
एक आदमी लगता था उस गाड़ी से उतरा
अपने चित्र खिंचक यंत्र में
उस अर्ध नग्न तन नारी को
कैद कर रहा था
और उसके झांकते अंगो से
सामीप्य बना रहा था
और दुधमुहा अपनी भूख कि खातिर
उस पुरुष कि भूख को बढ़ा रहा था
तभी सब तितर बितर हो गया
गाड़ी अपने सफ़र
नारी अपने सफ़र
और मै हकीकत पर चल पड़ा
पर मस्तिष्क में कैमरा गाड़ी और नारी
जम चुके थे
और मेरे कदम चौराहे से दूर थे
पर चौराहे पर
थम चुके थे


एक दिन मै कला प्रदर्शनी देखने
ज्यूँ ही कला गृह पहुंचा
ठिठक गया
और सारा ध्यान मेरा दिवार पर टंगे
चित्रों पर गया
हर चित्र में वही नारी वही साड़ी
वही अर्ध नग्न तन, वही दुधमुहे की लाचारी
झांक रही थी
और हर चित्र में लगी बिंदी
नारी चित्रों का मूल्यांकन आंक रही थी
हर चित्र का मूल्य लाख से कम न था
और उस गरीब नारी को खाने को अन्न न था
वह री खायी, गरीब ने अमीर और अमीर बनाया
और अमीर उस गरीब को दो वक्त का अन्न भी न दे पाया

ओ मेरे समाज सुधारकों समाज से पहले उन्हें सुधारों
जो पाते गरीब से खाते गरीब से
और देने की बात आते ही अपने
नाक मुह सिकोड़ करते नफरत गरीब से
आओ उन्हें बतलाओ अमीर तब तक अमीर है
जब तक इस जमीं पर दूसरी और गरीब है
अगर गरीब मर गया तो अमीर न बच पायेगा
एक अमीर दुसरे अमीर को अमीर नहीं कह पायेगा 
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