शनिवार, 25 दिसंबर 2010

उड़ने वालों सुनो

आकाश पर उड़ने वालों सुनो
तुमेह  धरती का है ये कहना
ऊँचा उड़ो चाहे तुम नभ छुलो
पर धरती पर तुम्हे है रहना

नभ पाने के तुम स्वप्न लिए
जीवन का चौथा हिस्सा जिए
जो मिला था उसकी बेकद्री
राहें जो चुनी सारी दर्द भरी
बिन पंख तुने  उड़ना चाहा
कटा सा तू  धरा पर आया
इसलिए तो कहता हूँ ये मै
आकाश पर उड़ने वालों सुनो


जागे हो या तुम सोये हुए
स्वप्नों में रहे सदा खोये हुए
मर्ग वाली तर्ष्णा सम्भाली थी
सच वाली जगह सब खाली थी
मुट्ठी बंद पर क्या मांगते तुम
मुट्ठी खोलो तब तुम पाओगे
इसलिए तो कहता हूँ ये मै
आकाश पर उड़ने वालों सुनो


हर रिश्ता है तुमेह लुभाने को
जीवन में कुछ समय बिताने को
पड़ाव आते ही  उतरते जायेंगे
संग तेरे कभी भी ना आयेंगे
फिर क्यूँ तू उड़ता रहता है
क्यूँ सच को ना तू सहता है
इसलिए तो कहता हूँ ये मै
आकाश पर उड़ने वालों सुनो

आकाश धरा का प्रेम है ये
वो देता धरा को जीवन भर
तू देख वो दोनों दूर सदा
रहते संग ज्यूँ ना हो जुदा
जो छोड़ धरा को नभ को चला
नभ ने उसे धरती पर ही मला     
इसलिए तो कहता हूँ ये मै
आकाश पर उड़ने वालों सुनो

7 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आसमान म्ं उड़ने वाले, मिट्टी में मिल जायेगा।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

हकीकत से जुडना ज़रूरी है .. अच्छी अभिव्यक्ति





यहाँ आपका स्वागत है

गुननाम

अनुपमा पाठक ने कहा…

धरा से जुड़ा है जीवन ,
आसमान तो भ्रम मात्र है!
सुन्दर सन्देश!!

vandana gupta ने कहा…

वाह! बहुत सुन्दर संदेश्।

Kailash Sharma ने कहा…

ऊँचा उड़ो चाहे तुम नभ छुलो
पर धरती पर तुम्हे है रहना

बहुत सार्थक सन्देश..सुन्दर प्रस्तुति

वाणी गीत ने कहा…

आकाश में उड़ते यह ना भूले की आखिर पैर जमीन पर ही टिकने हैं ...
सुन्दर !

Dorothy ने कहा…

सुंदर,सार्थक संदेश.आभार.
सादर,
डोरोथी.