रविवार, 7 अप्रैल 2019

नफ़रत


नफ़रत की गंध इस तरह फैल गई
फूलों की गंध भी उसमे नहीं मिल पाई
ड़ेंगू मलेरिया या हो चिकनगुनिया
केंसर पार्किनसन या हो एड्स
इनसे तो डॉक्टर मुक्त करा देंग
पर आपसी स्पर्धा में मुक्त कर नफरत। बढ़ा देंगे
   शत शत नमन उस भाई को
जिसने नफ़रत का  बीज बनाया
नष्ट नहीं हो इसका कोई कोना
ऐसा सुरक्षा कवच चारों ओर लिपटाय
पर है मानव नफरत के चाहे जितने बीज बनाता
पर इस नफरत रूपी ज़हर से रिश्तों को बचाता
पूत्र पिता से पुत्री अपनी जननी से एक सुर ऊपर उठाती है
उस समय माँत पिता की दृष्टि झुक जाती हैं
जब भाई भाई बिन।मेहनत पिता के खून पसीने को तोलते
औऱ बूत बना पिता आंखों में मोतियों की झड़ी लगते हैं
माँ अपने पति के सिर को सहलाते हुए कुछ नहीं कह पाती
पर अपनी आंखों को दब दबाते हुए वो सब कुछ कह दिया
देख मानव नफ़रत का बीज बोया पर प्रेम ने उसे बिना बोले धोया

1 टिप्पणी:

roopchandrashastri ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (08-04-2019) को "भाषण हैं घनघोर" (चर्चा अंक-3299) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'