बुधवार, 20 अप्रैल 2011

कटु सत्य

सुबह हुई सब उठ गए थे
मै अलसाया गुथ रहा था

क्यूँ हुई यह छद्म सुबह
बहकाती है बेवजह
ढले तलक ये दोडाएगी
अंत में फिर घर लाएगी

आना है तो जाना क्यूँ
बेकर्म कर्म पछताना क्यूँ
सुबह का आना पल भर है
उसकी बाट जोहना क्यूँ


सांझ की बस चाह हमें है
शीतलता की राह हमे है
जो देगी तीन पहर विश्राम
निश्चिन्तता को वो आराम
फिर काहे हम भूले साँझ
दिन का मैल बिना हम मांझ
सत्यता जब समक्ष खड़ी है
लुप्त गुप्त ये दिवस घडी है

आओ साँझ के घर को जाएँ
रिश्तों को हम और बढाएँ
आराम, अंत, विश्राम, अनंत,
पड़ाव, ध्यान, हैं साँझ के भाई
निद्रा, मूर्छा, निर्विघन चेतना
अंतिम वेदना सी बहने पाई
इनसे नाता है हमें जोड़ना
दिवस ढले पड़े सब छोड़ना

मत कर जीवन अस्त व्यस्त
सांझ का आना है कटु सत्य

3 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

कटु सत्य को सुन्दरता से अभिव्यक्त किया है। अच्छी लगी रचना। शुभकामनायें।

Sunil Kumar ने कहा…

मत कर जीवन अस्त व्यस्त
सांझ का आना है कटु सत्य
बहुत सुन्दर भाव लिए यह रचना, बधाई

govind ने कहा…

it is nice one...