शनिवार, 4 जून 2011

जीवन तू सागर न बन

जीवन तू सागर न बन 

सागर हर वस्तु से खेलता 
जिधर का रुख उधर धकेलता 
पर मेरी नौका के आगे 
सागर बेबस हो जाता है 

जीवन तू देख सम्भल जा 
हठ न कर धकेलने की 
मुझ जैसे विरले मिलेंगे 
न चाहें जीवन ठेलने की

जब तक मै था बिन नौका 
तुने खूब धकेला था 
अब मै नौका में चप्पू थाम
निश्चय कर अपना आया हूँ 

तेरे अटखेलिओं के संग 
स्वयं को न बहने दूंगा 
तू दिशा रहित बिन मंजिल के 
उस ओर नही बढने दूंगा 

तू मेरा जीवन है 
तुझे चलना होगा संग मेरे 
दृढनिश्चय मेरा मंजिल का  
तुझे बढना होगा संग मेरे 

जिस नौका की चाह थी 
वो नौका नाम दृढनिश्चय
ठान लिया तो ठान लिया
अपना ये छोटा सा परिचय

सागर खामोश बस हाथ मले 
जब पतवार लहर विरुद्ध चले 
जीवन तू सागर न बन 
वरना जीवन, जीवन से हाथ मले  
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