बुधवार, 1 जून 2011

कलम कवि की

जी चाहता है उन पर लिखूं 
जो अपना देश चलते हैं 
जनता की बर्बादी पर 
धोखे के आँसूं बहाते हैं 
पर ज्यूँ ही लिखने बैठा
कलम की नोक टूट जाती है 
यदि बदलता हूँ कलम 
स्याही तभी सूख जाती है 

इस अचरज पर अचरज कर
मैंने एक अध्ययन किया 
एक शिक्षा है जो मैंने पाई 
गाँधी बन्दर मुख पर हाथ 
कलम कवि की सच चलती 
झूठ चाहकर भी न लिखती 
चरित्र यदि समक्ष खड़ा हो 
स्वयं ही चलती जाती है 

मेरे चुने श्वेत वस्त्र धारकों 
चाह कर भी न लिख पाउँगा 
यदि कलम के विरुद्ध चला 
कलम से विमुक्त हो जाऊंगा 
कलम बिना जीना कठिन  
जीते जी भी मरा कहलाऊंगा  
तुम्हारे बिना कुछ न घटता 
विरह कलम न सह पाउँगा
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