रविवार, 12 सितंबर 2010

लाडो क्षमा

हंसी संजोये होठों पर
रखती आँखों मे वो पानी
मन मे सपने लिए अनोखे
वो पाले थी पेट मे रानी
अपनी अभी पुरुषार्थ दिखा वो
कह गए, बाहर कभी ना आए
पुरुष जना, जो बाहर खेले
आये तो बस पुरुष ही आए
अपनी लाडो पर हाथ रखे वो
सूखी आँखों से झांक बोली
लाडो जन कर पुरुष को हमने
नारी पर ये स्थिती बो ली
लाडो क्षमा मै तुझसे मांगू
 कर क्षमा तू माई को
 दोष यदि कोई मेरा बच्ची
क्षमा पुरुष की जाई को
तभी हुई एक अजब कहानी
पेट से सुनाई दी जुबानी
माँ थोड़ी तू हिम्मत रख
मेरे आगमन का दर्द भी चख
फिर तू देखेगी ये बेटी
प्रेम प्यार से हरेगी हेठी     
माँ देख तू भाई को
उसकी सूनी  कलाई को
भाई भी मुझको है चाहता  
छुप छुप आंख में पानी लाता 
तू कहती बापू न चाहता
बाप बिना कोई कैसे आता
दादी बुआ तुझे जो  कहती
अंदर मै सब सुनती रहती
तू उनको क्यूँ न समझती
 उनकी भी है नार्री जाती
जो वो दुनिया में न होती
वंश के बीज किस में बोती
दादा आया दादी लाया
बापू आया तुझे था लाया
काहे ये समझे ना कोई
हमने ही ये वंश बढाया
क्यूँ सीता चली थी अग्नि पर
क्यूँ द्रोपती पर पांचो का साया
गांधारी ने क्यूँ पट्टी बाँधी
क्यूँ सती का धर्म था छाया
हर प्रश्न का उत्तर तू पाए
पुरुष कम, सब नारी से आए
अब लगे समय वो आया
नारी को नारी ना भाए
चल उठ खड़ी हो अब तू
 बजा बिगुल उद्घोषणा कर तू
धरती करे बस वो ही पैदा
जिसका बीज उसमे जो बोवे
गर नारी अब बाँझ हो गई
समस्त धरा धराशाही होवे
अब सुधर तू अब सुधर
ओ समाज आवेगी लाज
एक दिन ऐसा आवेगा
एक ही जैसे दो जन मिलकर
ना पैदा कर पावेगा
रिश्तों का कर अंत
तू अपनों पर नज़र गडायेगा
फिर बस तू पछ्तावेगा
जब तेरा खेत चुगा जावेगा
जब तेरा खेत चुगा जावेगा


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