शनिवार, 22 अक्तूबर 2011

विरहन की विरह

बादल ने ली है अंगड़ाई
क्यूँ याद तुम्हारी आई
रिमझिम फुहार पड़ते
हिचकी पे हिचकी आई

मौसम को सहते रहते 
पर तुमसे कुछ न कहते 
एक जाता दूजा आता 
पर न हमको डिगा पाता
बारिश की ये जो बूंदे
छीने हैं मेरी तन्हाई 

सोचो तो क्या तब होता 
जो मौसम न ये आता 
मिलने की एक अग्न का 
अहसास न हो पाता 
अंगो ने तोडा मौन 
ज्यों ही चले पुरवाई

विरहन की विरह देखो 
रब से न देखि जाती 
वो कैसे सह रही है 
सहन न देखि जाती 
उस विरहन की अग्न को 
भडकाने बूंदें आईं   

बादल ने ली है अंगड़ाई
क्यूँ याद तुम्हारी आई
रिमझिम फुहार पड़ते
हिचकी पे हिचकी आई
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