सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

बिछड़े दोस्त

बुझ चूका है दिया मेरे संसार का
ग़म खाए जा रहा मुझे बिछड़े यार का 
वो बचपन का खेला वो जवानी का मेला 
संग संग रहे हम न छोड़ा अकेला
आज करके अकेला तू कहाँ छुप गया रे   
एक बार तो बता तू पता अपने घर का


न दिनों का पता था न रातों की चिंता 
संग चले थे सदा खोया पल भी नही था  
वो बारिश का पानी, उसमे भीगी जवानी 
गर्मियों की घमोरी, तन से टप टप पानी 
सर्दियों का वो कम्पन, दोस्त संग सहा था
अब कैसे कटेगी जिंदगानी पता क्या

उपर वाले बता तू तेरा कैसा ये खेला
बिछोड़ा तो बनाया क्यूँ प्यार उडेला
दोस्तों की कमी है तुने उसको बुलाया
एक बार ना सोचा कैसे दिल दहलाया
कैसे अब सहूँ बिछोड अपने यार का 
ग़म खाए जा रहा मुझे बिछड़े यार का
एक टिप्पणी भेजें