शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

रहमत

या खुदा ये कैसा कर्म है 
हम पर तेरी महर हुई 
बीत गया जो अंधकार था 
अब नई मेरी सहर हुई  

ये कैसी बदली काली थी 
दीखता था वो न दिखा 
बिछड़ गये जो अपने थे
संग साया तक भी न रुका 

नैनो से मोती न थमते 
जुबां हलक में जमती थी 
कान तरसते थे सुनने को
जो बाहों में थमती थी 

तेरी रहमत के आगे अब 
सजदा सजदा और सजदा 
कब क्या होगा कैसे होगा 
जाने तू बस तू है खुदा

या खुदा ये कैसा कर्म है 
हम पर तेरी महर हुई 
बीत गया जो अंधकार था 
अब नई मेरी सहर हुई
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