सोमवार, 2 अगस्त 2010

मत दिख थका

ता उम्र धकेला था जीवन
अब मंजिल की सुध आई
चलने से पहले दिखे थका
चल अब तो चलना  है भाई

पथरीले पथ चलते विरले
तू उन विरलों में एक बन
राह के राहगीर दिखेंगे तुझे
तू राह तेरी अपनी ही चुन

मंजिल है सबकी अलग अलग
तुझे अपनी मंजिल ही जाना है
राहगीरों की उस भीड़ में भी
तुझे अपना जहान बसना है

देखना, सुनना तुझे सबको है
पर तुझे तेरा ही राग बनना है
राहगीरों राह के भटके जो मिले
पर तुझे ढूँढना तेरा ठिकाना है

तू पा लेगा ये तुझे है पता
अब चल मंजिल की ओर तू
चाहे धुप जले या सांझ ढले
चल पथिक पायेगा भोर तू

अब चल तुझको बस चलना है
मंजिल चलके है कब आई
चलने से पहले मत दिख थका
चल अब तो चलना है भाई
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