सोमवार, 16 जनवरी 2012

अपराजिता

करुणा
बन अपराजिता
अर्पण कर
समर्पण जगा
बेल सी लिपट
वृक्ष निगल गई     

बुधवार, 4 जनवरी 2012

आज का दिन मै कैसे भूलूं

आज का दिन मै कैसे भूलूं
जबकि मुझ संग तुम चले हो
आज का दिन मै कैसे भूलूं
जबकि मन संग मीत मिले हों
छाज सा जीवन छन रहा था
उसमे कुछ अंश तुम मिले हो
अनचाही अत्रप्त धरा पर
अधरों ने आकर पुष्प छुए हों
खो चूका था मायने जिनके
आकर तुम ने अर्थ दिए हों
बालक मन था भटका भटका
बाँहों ने तुम्हारी झूल दिए हों
आज का दिन मै कैसे भूलूं
जबकि मुझ संग तुम चले हो


 



मंगलवार, 3 जनवरी 2012

चंदा की चांदनी

उम्र का ये पड़ाव
उफनता शांत पडा था
अचानक जैसे चंदा को देख
उम्र छोड़ लहरें मिलने दौड़ी

एक बदली धुंधला कर गई
पर चमक यादें फिर लाई
तुम तो अब तक न समझी
पर लगता था उम्र लौट आई

जर्जर तन न था किसी काबिल
पर उसपर लौहा प्रहार कर सम्भालने वाला
स्वप्न जैसे तुमसे पुन साकार हुआ
एक चंदा की चांदनी बन तुम आई  

 
 

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

नववर्ष

जो बीत गया वो अपना था
जो आ रहा  एक सपना सा
जाने वाले तुझे करते प्रणाम
आने वाला तुम हो मेहमान
जा रहा वो उसे दिली बिदाई
समस्त जन नववर्ष बधाई  


गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

राधे में

जो रम गया राधे राधे 
वो थम गया राधे राधे
गिरधर की मुरलिया न्यारी 
मोहन की मूर्ति प्यारी 
बांके को जिसने देखा 
सम्मोहित खड़ा सरीखा 
आँखे ने पल भी झपकी 
बस  खो गया राधे राधे   

कान्हा कान्हा का सुर है 
जो भटकाए आसुर है 
मेरे जीवन की नदी में 
कान्हा का पैंठा दर है 
कान्हा को रटते रटते 
रहूँ कान्हा के भंवर में    
कुछ और मुझे न सूझे
मै रम गया राधे राधे 


नैनो में वो है समाया
मेरे घट घट में वो आया
मेरी रग रग बहता जाये
मेरी जिव्या उसे ही गाये
मेरे नैन मूंद उसे देखें
तन उसी का नाम लपेटे
मुझे  चिंता  न  बीमारी 
मै गाऊं जो राधे राधे 

जो रम गया राधे राधे 
वो थम गया राधे राधे

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

कुछ ना पाया

अभी मरे कुछ वक़्त हुआ था, डरे डरे कुछ वक़्त हुआ था
कौन हूँ मै आया कैसे क्या होगा सोच जमा रक्त हुआ था
तभी किरण सी एक थी चमकी ध्वनि कानो में एक धमकी
सभी अपने पूर्व में जाएँ अच्छे बुरे का सब हिसाब बताएँ
मै अपनी यादों में खोया हिसाब किया क्या पाया क्या खोया
आह सोचते ही सिर्फ रोया सिर्फ रोया ...............

रातों को तो था मै सोया, स्वपनों में था सिर्फ खोया
पर जीवन में मानवता का बीज न बोया 
दिनों दिन भागा, सोया खोया, जागा भागा
चक्रव्यूह में गया फंसकर कुछ ना पाया बस भागा
सोचा जो क्या पाया क्या खोया
आह सोचते ही सिर्फ रोया सिर्फ रोया ..................

सभी तो थे, पर कोई ना था, सब कुछ था, कुछ ना था
जो जोड़ा था वो छोड़ा था, पर साथ ले जाऊं गुण थोडा था
खून के साथी साथ में ना थे, अवगुण थे गुण साथ ना थे
लकड़ी पाई अग्नि पाई, माटी माटी के संग आई
लोटा भर गंगाजल पाया, लगा मुझे क्यूँ था मै आया
सोचा जो क्या पाया क्या खोया,
आह सोचते ही सिर्फ रोया सिर्फ रोया..............

अब करने को हम ना थे, सहने को कोई ग़म ना थे
जो कुछ सहा सब छोड़ा छाडा, बस कुछ गज़ एक लट्ठा फाड़ा
सफ़र में चलने को त्यारी, कंधो पे थी पालकी हमारी
सब के मुख एक ही सुर था, अंतिम यात्रा का ये गुर था
कहने को सब अपने थे, जागे हुए कुछ सपने थे
अब आँख मिची हम जागे हैं, मरघट छोड़ सब भागे है
सोचा जो क्या पाया क्या खोया
आह सोचते ही सिर्फ रोया सिर्फ रोया............

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011

साहित्य से नजदीकी

हम साहित्य की बात कर रहे थे
क्या होगा साहित्य का
यह सोच सोच कर डर रहे थे
कैसे बचाएं यह धरोअर इस उजड़ते समाज से
और कैसे अब बचाए इसे महा पंडितों के दाग से

अचानक विपरीत पक्ष से सवाल दगा गया

साहित्य किसे कहते हैं ?
जवाब दिया जिसके बलबूते हम सभ्य शिक्षा पाते हैं
जिसके कारण हम सबके हित की कहते, गाते हैं
जिसके रिश्तेदार अब जीवन के आखिरी पड़ाव में हैं
जो वयस्क हैं वो व्यवसायिक अंश के जकडाव में हैं

फिर सवाल आया साहित्य कहाँ है?
मै कहता पग पग में
अचानक पूछ लिया साहित्य को कहाँ ढूंढे?
महसूस करो हर पल में
 
वो बोले पहचान बताओ
हम बोले पहचान है तुम्हारी हर साँस
तुम्हारी जिज्ञासा तुम्हारी हर आस
उसे खोजने की चाह उसके लिए हर आह
तुम्हारे जीवन की प्रतिबधता समाज की कुछ बचीकुची सभ्यता
रिश्तों की धुंधली मिठास पत्नी के मन का विश्वास
बहन की राखी की लाज, पति का पत्नी पर नाज
पिता का पुत्र पर अधिकार माँ की गोद का अहसास
एक घर एक परिवार एक गाँव एक संसार और हर क्षण की प्यास
हर गीत हर संगीत धरती आकाश हर भीत और हर ओर की राह

अरे जहाँ चाहो वो मिलता है उसके बिना पत्ता भी ना हिलता है
इससे पहले कुछ और पूछे हम ताव खा गए
और कह दिया तुम जो बचे हो साहित्य उसका कारण है
अगर हम साहित्य के नजदीक ना होते तुम यहीं खेत होते

तुम चाहो भी तो लुप्त ना होगा छिपाओगे पर गुप्त ना होगा
सांसें चलती उसकी लय में संसार चलता उसकी शय में
अगर जीवन है तो साहित्य है अगर मरण है तो साहित्य है
साहित्य समय का हर चरण है हमने ओढ़ा वो आवरण है