सोमवार, 19 दिसंबर 2011

कुछ ना पाया

अभी मरे कुछ वक़्त हुआ था, डरे डरे कुछ वक़्त हुआ था
कौन हूँ मै आया कैसे क्या होगा सोच जमा रक्त हुआ था
तभी किरण सी एक थी चमकी ध्वनि कानो में एक धमकी
सभी अपने पूर्व में जाएँ अच्छे बुरे का सब हिसाब बताएँ
मै अपनी यादों में खोया हिसाब किया क्या पाया क्या खोया
आह सोचते ही सिर्फ रोया सिर्फ रोया ...............

रातों को तो था मै सोया, स्वपनों में था सिर्फ खोया
पर जीवन में मानवता का बीज न बोया 
दिनों दिन भागा, सोया खोया, जागा भागा
चक्रव्यूह में गया फंसकर कुछ ना पाया बस भागा
सोचा जो क्या पाया क्या खोया
आह सोचते ही सिर्फ रोया सिर्फ रोया ..................

सभी तो थे, पर कोई ना था, सब कुछ था, कुछ ना था
जो जोड़ा था वो छोड़ा था, पर साथ ले जाऊं गुण थोडा था
खून के साथी साथ में ना थे, अवगुण थे गुण साथ ना थे
लकड़ी पाई अग्नि पाई, माटी माटी के संग आई
लोटा भर गंगाजल पाया, लगा मुझे क्यूँ था मै आया
सोचा जो क्या पाया क्या खोया,
आह सोचते ही सिर्फ रोया सिर्फ रोया..............

अब करने को हम ना थे, सहने को कोई ग़म ना थे
जो कुछ सहा सब छोड़ा छाडा, बस कुछ गज़ एक लट्ठा फाड़ा
सफ़र में चलने को त्यारी, कंधो पे थी पालकी हमारी
सब के मुख एक ही सुर था, अंतिम यात्रा का ये गुर था
कहने को सब अपने थे, जागे हुए कुछ सपने थे
अब आँख मिची हम जागे हैं, मरघट छोड़ सब भागे है
सोचा जो क्या पाया क्या खोया
आह सोचते ही सिर्फ रोया सिर्फ रोया............
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