शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

सच्चीमुच्ची

सच एक ऐसी चीज है
जो सब को नसीब है
लकिन आज के युग मे
कुछ की खो गई
कुछ रख कर भूल गए
कुछ के पास है
कुछ सत्यवादी हो गए

मै भी
सच को पूजता हूँ
हमेशा सम्भाल कर रखता हूँ
क्यूंकि उसका दुश्मन झूठ
हमेशा पिलाता है मुझे कड़वे घूँट
जब भी सच को सामने लाना चाहता हूँ
झूठ मुझे सताता हैअपना साम्राज्य याद दिलाता है
मुझसे कहता है
अरे मुर्खक्यूँ समय बर्बाद करता है
सच को याद करता है
मुझसे मांग जो मांगना है
किसको उल्टा किसको सीधा टांगना है

याद रख आज मेरा साम्राज्य है
और तुझे
किसी और का नहीं
सिर्फ मेरा हुकुम मानना है

अरे पापी
तुने एक बार हाथ बढाया था
मुझको अपनाया था
तुने सुना है दोस्त दोस्त के काम आता है
तू मुझे छोड़ के जाता है
मुझे देख
मै आज भी तेरे साथ हूँ था रहूँगा
तू ग़लत काम करयो
मै बचाता रहूँगा
अगर फिर भी
सच अपनाने की ठानी
छोड़ी न अपनी मनमानी
तो याद रख
आज तक तो दोस्ती देखी है
फिर पड़ेगी दुश्मनी निभानी
न पिटता हुआ पिटवा दूंगा
सरे आम मरवा दूंगा
दफ्तर में कलह
घर से निकलवा दूंगा
तू बड़ा मेरे बल पर छाती ताने घूमता है
अरे तन के सारे कपड़े उतरवा दूंगा
प्यार से कह रहा हूँ
दोस्त मान जा                  
सच से कुछ नहीं होने वाला
झूठ को पहचान जा
जब भी मेरे सामने ये घटना आती है
झूठ की याद सताती है
क्यूंकि जब भी सच बोला
दुख ही झेला

चुपचाप बताता हूँ
सच को भी पूजना चाहता हूँ
लेकिन
झूठ के डर से
तिजोरी में रखता हूँ
सामने लाने में घबराता हूँ  
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