मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

आटा बिखर गया

सर्दी में था पसीने से नहाया
गर्मी में था खून भी सुखाया
तब था गरीब ने खाना पाया
एक थैली भर वो आटा लाया
अमीरी ठोकरों से विफर गया 
गरीब का ही आटा बिखर गया

रफ्तारी कार पड़े आटे गुजरी
आटे ने आंतरिक लहू उगला
कर्राहट कौम की थी चीख पड़ी
आटा पड़ा रहा, बिखर पगला
ऊँचे ह्रदय न कुछ सिहर गया  
गरीब का ही आटा बिखर गया

दो जून रोटी उसी आटे से होती
अट्टालिकाएं झोंपड़ी दोनों पोती
मानव ने मानव को जुदा किया
रोटी को ही रोटी से अलेदा किया  
क्यूँ आटा आटे को अखर गया
गरीब का ही आटा बिखर गया
   

   


रविवार, 11 दिसंबर 2011

कैसे चुकाऊं कर्जा


हे प्रभु क्यूँ इस जहान पर इतना अत्याचार किया
जनम दिलवा माँ बाप से सबको करजदार किया

कैसे कर्जा चुकाऊं मैं यह सोच सारा जनम गया
पर कर्जा माँ बाप का मेरे संग आया संग ही गया

तेरी लीला तू जाने राजीव ना पूछे यह सब क्यूँ किया
पर एक बात तू सच बता तुने तेरे कर्जे का क्या किया

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

पुलिस में नौकरी

हे प्रभु एक विनती है तुमसे
मोकु अगला जनम ना दीजो
अगर भाग्य में जनम लिखा हो
पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो

ना ही चाहूँ सोना चांदी
ना ही चाहूँ महल दुमहले
बस एक डंडा दिलवा दीजो
पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो

पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो............

चोर डाकू कोई पकडूं नाही
रोज मै पूजूँ अफसरशाही
चाय पानी लेकर छोडन का
मोकु लाइसेंस दिलवा दीजो

पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो..........

अफसर बनना मै ना चाहूँ
कोई पदौन्ती मै ना पाऊं
पर मेरी नियुक्ति तो प्रभु
लाल बत्ती इलाके करवा दीजो

पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो.............

रिश्ते नाते कोई ना चाहूँ
घरवालों की बंदिश ना पाऊं
चाहूँ तो बस इतना चाहूँ
बिन कटोरी बिन भीख के
मांगना मुझको सिखला दीजो

पुलिस में नौकरी दिलवा दीजो.........

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

जीवन चक्र

आत्मा के अमर होते ही
भस्म हो गया शरीर
संग पानी के डोलता फिरा
चंचल मानव शरीर

लिया इस जल को खींच
जड़ों ने, वृक्षों पौधों के
बदली भस्म पुष्पों फलों 
वनस्पतिओं में

भोजन स्वरुप वनस्पति को
किया ग्रहण दम्पति ने
यज्ञ किये शरीर में
आत्माओं ने

बदल रूप आई भस्म
रक्त मांस के लघु कणों में
जुड़े वो कण बिंदु
गर्भ के क्षीर सागर में

पुन रूप बदल आई भस्मी
लिए एक बालक का जीवन 

रविवार, 4 दिसंबर 2011

बेटी बिदा होती बाबू

अपने आंसुओं पर रखो काबू
आज बेटी बिदा होती बाबू
बचपन में खेली जिस अंगना
आज वो भी चला मेरे संग ना
कैसे पिया का चल गया जादू

छोड़ कर सब सखियाँ सहेली
चिड़िया सी चहकती थी खेली
कर सूना तेरे घर का कोना
मै चली पर तू यादें न खोना
बेटी परछाईं कहती सदा तू

मैया अब तू किसे डांटेगी
किसके बालों में कंघी फांसेगी
खनखनाती खामोश रसोई
कोई तंग न करेगा तू सोई
कैसे अकेली सम्भालेगी घर तू 


भाई छोड़ चली तुझे बहना
तू माँ बापू का एक ही गहना
झगड़े जो हुए सब भूल जाना
पर राखी पर बहिना बुलाना   
देख बचपन छोड़ेगा अब तू

मुझे कर दिया सबने पराया
जब से पिया को मुझसे जुडाया
क्या बेटी का रिश्ता हूँ खोई
अब कुछ करूं, न रोके कोई
यही विधि का विधान बता तू

आज बेटी बिदा होती बाबू

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

सच्चीमुच्ची

सच एक ऐसी चीज है
जो सब को नसीब है
लकिन आज के युग मे
कुछ की खो गई
कुछ रख कर भूल गए
कुछ के पास है
कुछ सत्यवादी हो गए

मै भी
सच को पूजता हूँ
हमेशा सम्भाल कर रखता हूँ
क्यूंकि उसका दुश्मन झूठ
हमेशा पिलाता है मुझे कड़वे घूँट
जब भी सच को सामने लाना चाहता हूँ
झूठ मुझे सताता हैअपना साम्राज्य याद दिलाता है
मुझसे कहता है
अरे मुर्खक्यूँ समय बर्बाद करता है
सच को याद करता है
मुझसे मांग जो मांगना है
किसको उल्टा किसको सीधा टांगना है

याद रख आज मेरा साम्राज्य है
और तुझे
किसी और का नहीं
सिर्फ मेरा हुकुम मानना है

अरे पापी
तुने एक बार हाथ बढाया था
मुझको अपनाया था
तुने सुना है दोस्त दोस्त के काम आता है
तू मुझे छोड़ के जाता है
मुझे देख
मै आज भी तेरे साथ हूँ था रहूँगा
तू ग़लत काम करयो
मै बचाता रहूँगा
अगर फिर भी
सच अपनाने की ठानी
छोड़ी न अपनी मनमानी
तो याद रख
आज तक तो दोस्ती देखी है
फिर पड़ेगी दुश्मनी निभानी
न पिटता हुआ पिटवा दूंगा
सरे आम मरवा दूंगा
दफ्तर में कलह
घर से निकलवा दूंगा
तू बड़ा मेरे बल पर छाती ताने घूमता है
अरे तन के सारे कपड़े उतरवा दूंगा
प्यार से कह रहा हूँ
दोस्त मान जा                  
सच से कुछ नहीं होने वाला
झूठ को पहचान जा
जब भी मेरे सामने ये घटना आती है
झूठ की याद सताती है
क्यूंकि जब भी सच बोला
दुख ही झेला

चुपचाप बताता हूँ
सच को भी पूजना चाहता हूँ
लेकिन
झूठ के डर से
तिजोरी में रखता हूँ
सामने लाने में घबराता हूँ  

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

मेरी बारात

आओ बनाओ दूल्हा मुझे
मेरी बारात ले चलो
पहने हैं नये वस्त्र अभी
मेरी ये राख ले चलो

दूल्हन बनी खड़ी है जो
आओ ब्याहने उसको चले
पहने है स्याह जोड़ा नया
आओ लिवाने उसको चलें

आज पहली रात है दोनों की
सब छोड़ अकेले आओगे
फिर जो निभाए बंधन हमने
तुम देखने एक पल आओगे

एक तोहफे का तो हकदार हूँ मै
चक्षु न करना नम कभी
रहें सदा हम दोनों यूँ ही
बस ये दुआ करना सभी