मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

धर्म ढूंढता

चर्च के बाहर पड़ा पालना
उसमे नवजात को डालना 
माँ है बाप है ये तो तय है
इसमें बदनामी का भय है
ये कर्म किस धर्म में आता है

अजान याद, तो है मुसल्लम 
जनेऊ धरे, तो वो पंडित सम,
वाहे गुरु, तो शबदों में पारंगत
बाइबल की सीख का ज्ञाता है
स्वयं से जूझता फिरूं मै पूछता 
ये कर्म किस धर्म में आता है


मस्जिद में वो अजान को तरसे 
मन्दिर में खड़ा प्रसाद को तरसे 
ग्रन्थि संग पर अरदास को तरसे 
जीजस की जला कर मोमबत्ती वो 
तरसे पूछता, जीवन जीने की चाह
ये कर्म किस धर्म में आता है


हे सूरज तुम कैसे अपना धर्म 
इन धर्मों संग चल निभाते हो 
जल चलते रहते हरपल कलकल
नैया धर्मो की अलग चलाते हो
प्रकृति का धर्मों से घर नाता है
ये कर्म किस धर्म में आता है

मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे
बनाये जिसने, गया हमें दे सारे
पीर  पुजारी, पादरी, ग्रंथि हमारे 
उसकी शक्ति तो सभी बतला रहे 
पाँच हैं छठी ना कोई बताता है
ये कर्म किस धर्म में आता है

पर करूं क्या, मै  यूँ खड़ा खड़ा
धर्म अपना ढूंढता, था पालने पड़ा
सर्व धर्म अपने लहू संग है दौड़ते
पूछता धर्म, क्यूँ मुख सभी मोड़ते 
किसने बनाए, बांटे धार्मिक धर्म    
ये कर्म धर्म, न कोई बताता है

दीवाना

कैसे तबाह करके, मुझे तुम चले गए 
एक झलक दिखा कर दीवाना कर गए

आज़ाद था घूमता दिल की लगी से दूर
दिल से दिल मिला कर दिवाला कर गए 

हमको था गरूर अपने दौलत ए दिल का 
लुट गये एक पल में,  सब कुछ लुटा गए

पर्दे में छुपा था यूँ, खुदा का तराशा नूर
झोंके से हवा के, हम खुद ही बिखर गए

बस्ती अपनी गुम थी, तन्हा पड़े थे हम
कदमो की आहट थी, तूफान गुजर गए

नजूमी ने कहा था, उम्र है बरसों बरस
रूह भटकती है यूँही, जीते जी मर गए 

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

ख़ुशी आई

गरीब के घर आज ख़ुशी आई 
बेटी के रूप में किलकारी पाई
तेरा कर्म सब पर बराबर होता 
पर मेरे नसीब में गरीबी आई 

चाहता हूँ न ये यौवन तक जाये 
सुन्दरता न सम्मुख कभी आये 
स्वप्नों की दुनिया में बस ये देखे 
भूख समर्पण पसीने में नहायी 

गरीब के घर आज ख़ुशी आई 

नही फटा ये वस्त्र कभी पहने 
कान न कभी सुने नाम गहने 
तितली न कभी सखी हो इसकी 
बस याद रहे ये है गरीब की जाई

गरीब के घर आज ख़ुशी आई 

देह की अग्नि से दूर ही रहे सदा 
श्रम अभाव लाचारी इसकी सम्पदा 
दुल्हन पालकी प्यार से न वास्ता 
खेले संग लिए घुटन और तन्हाई
गरीब के घर आज ख़ुशी आई 

रविवार, 10 अप्रैल 2011

शहर की छोरी

तुम ठहरी शहर की छोरी
मै खेड़े गाँव का बावला 
ये प्रेम क्यूँ कैसे हो गया 
मै मूढ़ फंसा अच्छा भला

तेरी सादगी मुझे है भाई 
छ्ल कपट की बू न पाई 
मै चाहूँ तुझे अपना पति
मुझे तू ही लगा सबसे भला

तेरी गोरी निखरी काया
यहाँ तगड़ी धूप का साया
तुझे दुखी दखने से पहले
ओ ऊपरवाले मुझे बुला

पिया जहाँ तू रहे मै रहूँ
तेरी सूखी में भी सुखी रहूँ
मेरा सोया भाग्य खुल जाये
जो लेलूं तेरी बुरी बला

अरी पगली जिद तू छोड़ दे
किसी शहरी से नाता जोड़ के
मुझ गरीब के पास न रहने को
नई चुनरी को नहीं एक धेला    

नही चुनरी तुझसे मांगू
ये शहरी रूप मै त्यागूँ
बस तुझ संग फेरे हो जाएँ
चाहे उसके बाद मर जाऊं

न ऐसे शब्द तू बोल
ले खड़ा मै बाहें खोल
आजा दोनों एक हो जाएँ
आई है मिलन की शुभ बेला

शनिवार, 9 अप्रैल 2011

विरला

सीधी राह ढूंढे न मिली 
पथरीले पथ विरले चले 
तू एक अकेला चल चला 
मंजिल पाने बन विरला 
कष्टों के घाव न दिखें तेरे
जो तेरे हैं वो न दिखें तेरे 
काँटों को अब फूल समझ
फूल महके, उसे दूर समझ 
चेहरा पढ़ तेरा न पता चले 
थकन की अग्न, न तू गले  
पथिक तुझे संग ले जायेंगे
राह  मंजिल की भटकायेंगे 
जो मंजिल तेरे समक्ष खड़ी
भुला, तुझे ओझल करवायेंगे
तू एक अकेला बन विरला 
देख पीछे पीछे सब आयेंगे    

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

धरती के बोझ

हम धरती के बोझ हैं बाबा 
हम धरती के बोझ
भ्रष्टाचारी हैं हम पक्के 
दूजी न कोई सोच बाबा

चाहे जो तुम काम बोलो 
हम करें नोटों से तोलो 
अपने रिश्ते नाते हैं सब 
बस तुम जाओ तिजोरी खोलो 
मंत्री हो या कोई संतरी 
रखे हम सबकी जंत्री 
आदेश न्यायिक पास करालो
अपना है यही काम रोज बाबा

हम धरती के बोझ

नेता हो या अभिनेता हो 
घूस न चाहे कोई लेता हो 
सोफे पर या मेज के नीचे 
पैसे रखें दांतों में भींचे 
कैसे कब किसको पकड़ें 
अपने हाथ हैं सबसे तगड़े 
काम होगा विश्वास हमारा  
कलदार पूजें रोज हम बाबा 

हम धरती के बोझ 


गीत

मै गुनगुनाया जाता हूँ   
मै गुनगुनाया जाता हूँ  
धुन के धागे में पिरोकर 
धुन संग गाया जाता हूँ

सुबह पंछियों की चहक से    
सोंधी माटी की महक से  
बहते पानी से मचलते 
मीन जैसे खेल उछलते 
खेतों में लहलहाती सरसों 
कहीं खो गये अर्थ जो बरसों 
अब नही कहीं पाता हूँ 

मुझ में थी बेटी बिदाई 
रक्षा बंधन की कलाई 
प्रेमिका की नयन भराई
प्रेम के अर्थों की रुबाई 
ममता में वो डांटती माई 
खून पसीने की कमाई 
मुझमे ढूंढ़ नहीं पाता हूँ

देश भक्ति थी टपकती 
त्योहारों की ख़ुशी छलकती 
बालपन के खेल अनोखे 
एकजुट सब दूर थे धोखे
नदियाँ खेलें सागर सागर
गोरी के सिर छलके गागर
स्वप्नों में ही पाता हूँ

आज जो भी मुझमे आता
आकर कब वो गुम हो जाता
शब्द सरीखे पुष्प साथी  
अर्थों का इत्र लगाते थे 
कोई तो अब आगे आओ 
मेरे खोये शब्दों को लाओ 
अर्थों के अर्थ न पाता हूँ