शनिवार, 9 अप्रैल 2011

विरला

सीधी राह ढूंढे न मिली 
पथरीले पथ विरले चले 
तू एक अकेला चल चला 
मंजिल पाने बन विरला 
कष्टों के घाव न दिखें तेरे
जो तेरे हैं वो न दिखें तेरे 
काँटों को अब फूल समझ
फूल महके, उसे दूर समझ 
चेहरा पढ़ तेरा न पता चले 
थकन की अग्न, न तू गले  
पथिक तुझे संग ले जायेंगे
राह  मंजिल की भटकायेंगे 
जो मंजिल तेरे समक्ष खड़ी
भुला, तुझे ओझल करवायेंगे
तू एक अकेला बन विरला 
देख पीछे पीछे सब आयेंगे    

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

धरती के बोझ

हम धरती के बोझ हैं बाबा 
हम धरती के बोझ
भ्रष्टाचारी हैं हम पक्के 
दूजी न कोई सोच बाबा

चाहे जो तुम काम बोलो 
हम करें नोटों से तोलो 
अपने रिश्ते नाते हैं सब 
बस तुम जाओ तिजोरी खोलो 
मंत्री हो या कोई संतरी 
रखे हम सबकी जंत्री 
आदेश न्यायिक पास करालो
अपना है यही काम रोज बाबा

हम धरती के बोझ

नेता हो या अभिनेता हो 
घूस न चाहे कोई लेता हो 
सोफे पर या मेज के नीचे 
पैसे रखें दांतों में भींचे 
कैसे कब किसको पकड़ें 
अपने हाथ हैं सबसे तगड़े 
काम होगा विश्वास हमारा  
कलदार पूजें रोज हम बाबा 

हम धरती के बोझ 


गीत

मै गुनगुनाया जाता हूँ   
मै गुनगुनाया जाता हूँ  
धुन के धागे में पिरोकर 
धुन संग गाया जाता हूँ

सुबह पंछियों की चहक से    
सोंधी माटी की महक से  
बहते पानी से मचलते 
मीन जैसे खेल उछलते 
खेतों में लहलहाती सरसों 
कहीं खो गये अर्थ जो बरसों 
अब नही कहीं पाता हूँ 

मुझ में थी बेटी बिदाई 
रक्षा बंधन की कलाई 
प्रेमिका की नयन भराई
प्रेम के अर्थों की रुबाई 
ममता में वो डांटती माई 
खून पसीने की कमाई 
मुझमे ढूंढ़ नहीं पाता हूँ

देश भक्ति थी टपकती 
त्योहारों की ख़ुशी छलकती 
बालपन के खेल अनोखे 
एकजुट सब दूर थे धोखे
नदियाँ खेलें सागर सागर
गोरी के सिर छलके गागर
स्वप्नों में ही पाता हूँ

आज जो भी मुझमे आता
आकर कब वो गुम हो जाता
शब्द सरीखे पुष्प साथी  
अर्थों का इत्र लगाते थे 
कोई तो अब आगे आओ 
मेरे खोये शब्दों को लाओ 
अर्थों के अर्थ न पाता हूँ

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

वक्त

हमने खुदा से माँगी बीमारी 
सोचा वो आयेंगे हाल पूछने 
उन्होंने कब्रिस्तान की राह ली
हमारे लिये कब्र की तलाश में  


रविवार, 3 अप्रैल 2011

अजब गजब सी दुनिया सारी

अजब गजब सी दुनिया सारी
अजब गजब लगा रेला है 
जो चढ़ता वो पूजा जाता 
जो गिरता, पाता ढेला है 

दुनिया में जो रोंदे जाते 
वो कहते हमने झेला है 
रोंदने वाला जब मिलता 
कहते प्रभु का चेला है 

वस्त्रों में निर्वस्त्र रहकर 
उनका चलन अकेला है 
वो बढ़ चलें हम चल चलें 
बदरंगों ने रंग ये खेला है 

अपमान हमारे मान उन्हें 
काहे का चढ़ा अभिमान उन्हें 
हम न सहते, वो क्या कहते 
ये घर करता, तू अकेला है 

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

मेरी शादी

कल तक था मै एक कुंवारा 
गलियों फिरता था आवारा 
आज मुझ पर रोक लगा दी
क्योंकि आज है मेरी शादी 

शशि रंजना सब रोयेंगी
टीना मीना बाट जोहेंगी 
रीना सुनीता सभी गंवादी
क्योंकि आज है मेरी शादी

पीलिये का बुखार हो गया
हल्दी संग अब प्यार हो गया
खूबसूरती की परत चढ़ा दी 
क्योंकि आज है मेरी शादी

अपना कमरा अपना पलंग 
बंद दरवाजा पड़े अधनंग
कैसे छोड़े जिसके थे आदि   
क्योंकि आज है मेरी शादी

पुराने पत्र पुराने सब चित्र 
कैसे ताड़ेंगे वो हसीन मित्र 
अब बंधे खूंटे आज़ादी त्यागी
क्योंकि आज है मेरी शादी

नून तेल लकड़ी का भाव
मिर्च मसाला रोटी पुलाव 
मोल भाव के होंगे हम आदि 
क्योंकि आज है मेरी शादी

एक डर अब सदा खायेगा 
छुपा लो, पता लग जायेगा 
दिल की छमिया बुआ बनादी
क्योंकि आज है मेरी शादी

अब हम बच्चों के मामा होंगे
परायी देख ना आँख मलेंगे 
जिंदा होंगे मौत के ही आदि 
क्योंकि आज है मेरी शादी   

 

सोमवार, 28 मार्च 2011

नैन

नैनो से लड़े जब नैन
ना सुख पाया ना चैन
पथराये से खोये खोये
कुछ ढूंढ़ रहे सब रैन

नैनो के द्वारे कसक
मन में उठती है टीस
प्रेम की सुनती धमक 
अंगो में चलती चीस
बेदर्दी दर्द को बढ़ाकर
हरने लगते सुख चैन  

लाज आती ज्यूँ मिलते
नहीं मिलते तो मचलते
तुमको न कहीं खो जाएँ
पग संभल संभल चलते
नहीं सोते नहीं जग पाते
बावरे हुए फिरतें ये नैन 

सावन के अंधे  हो गए
तुम्हारे रूप संग खो गए
जादू कर चुरा के जीवन
हम सम्मोहन में सो गए
नहीं चाहें टूटे अब नींद
तुम्हे कैद कर गये नैन

नैनो से लड़े जब नैन
ना सुख पाया ना चैन