निहार सुन्दरता धरा की
सपनो का तानाबाना बुना
रंग हरा संजोयें हम कैसे
ना ही कोई माध्यम चुना
पर्वतों की रक्षक श्रंखलायें
लुप्त हो धरा को नग्न कर
हमे हर पल चेताएँ जा रही
बस बहुत हुआ अब बस कर
क्यूँ दे घाव धरती का सीना
मातृत्व को तू लज्जाता है
तेरे अपने आयें पायेंगे क्या
सोच क्यूँ तू व्यर्थ गवांता है
जल को जला रसायन बना
कब तक तू उपर उड़ा पाएगा
बादल जो जल भर लाते हैं
उनको भी वंचित करवाएगा
बिन भेदभाव जो वो बरसाते
उनमे क्या स्वार्थ जगायेगा
जंगल सागर कुएं की गागर
सब कुछ तू यूँ ही गँवाएगा
प्राकृतिक जो तू मुफ्त पाता
कृत्रिम कर दे जग जायेगा
राजीव संभल कर चल प्यारे
अन्यथा करनी को पछतायेगा
गुरुवार, 25 नवंबर 2010
मंगलवार, 2 नवंबर 2010
शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
बापू तेरा हिंद
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को
बढती हुई अत्याचारी महंगाई तूफान को
आजाद हिंद के टुकड़े देखो हो रहे हैं बार बार
भाई भाई पर करने को तैयार खड़ा है अत्याचार
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को................
विरोधी ताकतें लडवा रही हैं, हिंद की हर जुबान को
नशे की दुनिया खाए जा रही, आज के नौजवान को
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को...............
दहेज़ का दानव मुह फाड़े है, आज के हिंदुस्तान में
बहुओं का संघार हो रहा, आग के इस अभियान में
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को................
जग में अपना नाम है छाया, देखो इस विज्ञान को
भ्रष्टाचारी की माहामारी, निगले अपनी शान को
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को................
गांधीगिरी का सपना देखे मुन्ना भाई चलचित्र पर
पर गाँधी के दिए आदर्श ना देखे किसी चरित्र पर
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को................
वैष्णव जन तू उनको कहता जो पीर पराई जाने रे
आज के युग का मानव पीर संग मार कुटाई माने रे
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को................
खादी जो तू छोड़ गया था अब भी तह कर रखी है
पाँच वर्ष में एक बार सीमा नेता ने तय कर रखी है
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को................
बढती हुई अत्याचारी महंगाई तूफान को
आजाद हिंद के टुकड़े देखो हो रहे हैं बार बार
भाई भाई पर करने को तैयार खड़ा है अत्याचार
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को................
विरोधी ताकतें लडवा रही हैं, हिंद की हर जुबान को
नशे की दुनिया खाए जा रही, आज के नौजवान को
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को...............
दहेज़ का दानव मुह फाड़े है, आज के हिंदुस्तान में
बहुओं का संघार हो रहा, आग के इस अभियान में
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को................
जग में अपना नाम है छाया, देखो इस विज्ञान को
भ्रष्टाचारी की माहामारी, निगले अपनी शान को
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को................
गांधीगिरी का सपना देखे मुन्ना भाई चलचित्र पर
पर गाँधी के दिए आदर्श ना देखे किसी चरित्र पर
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को................
वैष्णव जन तू उनको कहता जो पीर पराई जाने रे
आज के युग का मानव पीर संग मार कुटाई माने रे
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को................
खादी जो तू छोड़ गया था अब भी तह कर रखी है
पाँच वर्ष में एक बार सीमा नेता ने तय कर रखी है
देख रहा है बापू तू अपने हिंदुस्तान को................
सोमवार, 27 सितंबर 2010
नन्हे नन्हे
तुने नन्हे नन्हे हाथ दिए हैं
उनसे कैसे तुझको पाऊं मैं
पवन चले जब भी बसंती
लहलहाती खेत सरसों के
चुनरी उड़ उड़ जगह छोड़े
कैदी मन अंदर यूँ मचले
कैसे पकड़ बाहर उडाऊं मैं
पहली किरण से बाबा सूरज
जब लगे नैनों को चमकाने
चाहूँ मुट्ठी में उन्हें लिपटाना
चंचल खेलें खेल आवे जावे
कैसे उन्हें कस कर दबाऊं मैं
नदिया की हर लहर पुकारे
बैठ बतियाता उस किनारे
लहरें गातीं यूँ गीत हर पल
जीवन जीता सरगम सहारे
सरगमी लहरें कैसे लाऊं मैं
चंदा मस्त हो चांदनी संग
कर ठिठोली फिर इतराए
प्रेम की अपनी भाषा बोले
हमे शीतलता मे नहलाये
कैसे प्रेम मधुरता पाऊं मैं
उनसे कैसे तुझको पाऊं मैं
पवन चले जब भी बसंती
लहलहाती खेत सरसों के
चुनरी उड़ उड़ जगह छोड़े
कैदी मन अंदर यूँ मचले
कैसे पकड़ बाहर उडाऊं मैं
पहली किरण से बाबा सूरज
जब लगे नैनों को चमकाने
चाहूँ मुट्ठी में उन्हें लिपटाना
चंचल खेलें खेल आवे जावे
कैसे उन्हें कस कर दबाऊं मैं
नदिया की हर लहर पुकारे
बैठ बतियाता उस किनारे
लहरें गातीं यूँ गीत हर पल
जीवन जीता सरगम सहारे
सरगमी लहरें कैसे लाऊं मैं
चंदा मस्त हो चांदनी संग
कर ठिठोली फिर इतराए
प्रेम की अपनी भाषा बोले
हमे शीतलता मे नहलाये
कैसे प्रेम मधुरता पाऊं मैं
तुने नन्हे नन्हे हाथ दिए हैं
उनसे कैसे तुझको पाऊं मैं
शनिवार, 25 सितंबर 2010
पूरी तैयारी?
गोली चली कार फटे
विदेशी खेलों से हटे
कम खिलाडी जीत हमारी
अब समझे पूरी तैयारी?
खरीद सस्ती किराया भारी
खाना पूर्ति पृष्ठों पर हमारी
धरती के हम बोझ हैं भारी
पाओ दर्शन हम भ्रष्टाचारी
अब समझे पूरी तैयारी ?
ये संजोग आगे बढने का
हर पदक घर में रखने का
डेंगू , गुनिया से रिश्तें अपने
चाहें खेलें कम असल खिलाडी
अब समझे पूरी तैयारी ?
पुल बनाए गाँव बसाए
समय से पहले यदि गिर जाएँ
बचाया बांटे जो बुलाए समिति
फूटी किस्मत की लाचारी
अब समझे पूरी तैयारी ?
प्रभु सुबह शाम यही प्रार्थना
इस बार पदक हमे ही बाटना,
प्रतियोगी आएं पाएं बीमारी
चाहे सरकार रहे ना रहे हमारी
अब समझे पूरी तैयारी ?
अतिथि देवो भव:,
अतिथि देव रहें सुरक्षित
आने से तुम उनको रोको
ना हो कलंकित धरा हमारी
अब समझे पूरी तैयारी ?
सुनते हम दिल्ली मेरी शान
घोंट गला, निकलने को जान
सुर में हो या बेसुर ज्ञान
पर गाती मुखिया हमारी
हमारी है पूरी तैयारी?
विदेशी खेलों से हटे
कम खिलाडी जीत हमारी
अब समझे पूरी तैयारी?
खरीद सस्ती किराया भारी
खाना पूर्ति पृष्ठों पर हमारी
धरती के हम बोझ हैं भारी
पाओ दर्शन हम भ्रष्टाचारी
अब समझे पूरी तैयारी ?
ये संजोग आगे बढने का
हर पदक घर में रखने का
डेंगू , गुनिया से रिश्तें अपने
चाहें खेलें कम असल खिलाडी
अब समझे पूरी तैयारी ?
पुल बनाए गाँव बसाए
समय से पहले यदि गिर जाएँ
बचाया बांटे जो बुलाए समिति
फूटी किस्मत की लाचारी
अब समझे पूरी तैयारी ?
प्रभु सुबह शाम यही प्रार्थना
इस बार पदक हमे ही बाटना,
प्रतियोगी आएं पाएं बीमारी
चाहे सरकार रहे ना रहे हमारी
अब समझे पूरी तैयारी ?
अतिथि देवो भव:,
अतिथि देव रहें सुरक्षित
आने से तुम उनको रोको
ना हो कलंकित धरा हमारी
अब समझे पूरी तैयारी ?
सुनते हम दिल्ली मेरी शान
घोंट गला, निकलने को जान
सुर में हो या बेसुर ज्ञान
पर गाती मुखिया हमारी
हमारी है पूरी तैयारी?
सोमवार, 20 सितंबर 2010
सुखद सपना
हम इंसान हैं इंसान को इंसान देखना चाहतें हैं
मानवता का पूज्य वो भगवान देखना चाहतें हैं
धर्म कर्म हो अपने साँझा, ना लगे किसी को ठेस
अपना हो एक ऐसा देश, जिसमे हो लुभावने वेश
रंग बिरंगी चाहतों का आकाश देखना चाहते हैं
हम इंसान हैं इंसान को इंसान देखना चाहतें हैं......
बोलें हम ऐसी बोली, ना झगडा हो ना चले गोली
दुश्मन ना कोई उपजे, लगे फसल प्रेम की बोली
एक ऐसा अपना प्यारा, किसान देखना चाहतें हैं
हम इंसान हैं इंसान को इंसान देखना चाहतें हैं......
स्वतंत्र हो हर इन्सान, परिंदों को हो आसमान
दूर तक फैलाए महक, ऐसे फूलों का गुलिस्तान
ना कांटे ना चुभन, बागबान एक ऐसा चाहते हैं
हम इंसान हैं इंसान को इंसान देखना चाहतें हैं......
आदर प्रेम और दुलार, पायें बांटे बस हम प्यार
हर तरफ हो खुशियाँ, मुस्काता हो अपना संसार
नफरतों की जड़ मिटाए, फिर चाणक्य चाहते हैं
हम इंसान हैं इंसान को इंसान देखना चाहतें हैं......
मानवता का पूज्य वो भगवान देखना चाहतें हैं
धर्म कर्म हो अपने साँझा, ना लगे किसी को ठेस
अपना हो एक ऐसा देश, जिसमे हो लुभावने वेश
रंग बिरंगी चाहतों का आकाश देखना चाहते हैं
हम इंसान हैं इंसान को इंसान देखना चाहतें हैं......
बोलें हम ऐसी बोली, ना झगडा हो ना चले गोली
दुश्मन ना कोई उपजे, लगे फसल प्रेम की बोली
एक ऐसा अपना प्यारा, किसान देखना चाहतें हैं
हम इंसान हैं इंसान को इंसान देखना चाहतें हैं......
स्वतंत्र हो हर इन्सान, परिंदों को हो आसमान
दूर तक फैलाए महक, ऐसे फूलों का गुलिस्तान
ना कांटे ना चुभन, बागबान एक ऐसा चाहते हैं
हम इंसान हैं इंसान को इंसान देखना चाहतें हैं......
आदर प्रेम और दुलार, पायें बांटे बस हम प्यार
हर तरफ हो खुशियाँ, मुस्काता हो अपना संसार
नफरतों की जड़ मिटाए, फिर चाणक्य चाहते हैं
हम इंसान हैं इंसान को इंसान देखना चाहतें हैं......
मायने
शब्द कोष मे शब्द पढ़े थे
सुंदर वाक्यों मे भी जड़े थे
आज मायने पूछने उनके
जब कोई मुझ तक आता है
मै उम्र के इस पड़ाव मे
उनको विस्तृत समझाता हूँ
हम उस युग मे जो भी पढ़ते थे
उसे अपने जीवन संग गढ़ते थे
तब लिखे के मायने असल थे
चरित्र मे डूबे, दर्शाते अमल थे
आज कठिन लगते हैं मायने
गुरु भी ढूंढें, समझाने के बहाने
तब प्रेम प्रेम, और द्वेष द्वेष था
आज प्रेम द्वेष का मायने एक
जो झलकावे अधूरी शिक्षा है पाई
तख्ती कलम खोए सूखी रोशनाई
सीख सीखी तब रखना चाहूँ याद
मायने वही जिसमे ना हो अपवाद
सुंदर वाक्यों मे भी जड़े थे
आज मायने पूछने उनके
जब कोई मुझ तक आता है
मै उम्र के इस पड़ाव मे
उनको विस्तृत समझाता हूँ
हम उस युग मे जो भी पढ़ते थे
उसे अपने जीवन संग गढ़ते थे
तब लिखे के मायने असल थे
चरित्र मे डूबे, दर्शाते अमल थे
आज कठिन लगते हैं मायने
गुरु भी ढूंढें, समझाने के बहाने
तब प्रेम प्रेम, और द्वेष द्वेष था
आज प्रेम द्वेष का मायने एक
जो झलकावे अधूरी शिक्षा है पाई
तख्ती कलम खोए सूखी रोशनाई
सीख सीखी तब रखना चाहूँ याद
मायने वही जिसमे ना हो अपवाद
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