गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

तो

बांस यदि बांस तो सर फूटें 
बंसी के छेद, तभी स्वर फूटें 
रिश्तों में भेद हो तो घर टूटें 
धर्म यदि खेल बने जग टूटे 
प्रेम बने व्यापर तो रब रूठे
माट्टी उपजाऊ, अंकुर  फूटे
धरती को छेदों,  जल फूटे

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

चाहता हूँ

मौत के वातावरण में 
ठिठकते हर चरण में 
धर्म ग्रंथो की शरण में
सुनना सुनाना चाहता हूँ 
गुनगुनाना चाहता हूँ 

पीठ में कुछ घाव लिए 
सियासतों के दाव लिए 
मन में मसलते चाव लिए 
उड़ना उड़ाना चाहता हूँ 
गुनगुनाना चाहता हूँ 

शीशे में खुद को निहारता 
भीतरी गंद भीतर बुहारता 
बंद आवाज़ में सब पुकारता 
बसना बसाना चाहता हूँ 
गुनगुनाना चाहता हूँ 

मिर्च संग नीबू टांगकर  
काले तिलक भौंवे तानकर 
आग घर में लगा जानकर 
बचना बचाना चाहता हूँ
गुनगुनाना चाहता हूँ  

मेरी दूजी हो

तुमने बुझा है जो, लो आज मै कहता हूँ 
वो सहा न जाता था, जो आज सहता हूँ 

वो मेरा था प्रथम प्रेम, 
जिसने झुलसना सिखलाया 
भूल गया कुछ याद नही 
पर तुम मेरी दूजी हो 

कदम थे दहलीज पर रखे 
तभी जो आया झोंका था 
सम्भल सम्भल सुध आई 
तुम वो समझी बुझी हो 
हाँ तुम मेरी दूजी हो 

प्रथम में जो कडवाहट थी 
सामाजिक घबराहट थी 
उस चक्रविहऊ से निकले
तो जो शांति खोजी हो 
वो तुम मेरी दूजी हो 

पुराने पन्ने खोल तुमने 
इति के तार क्यूँ छेड़े हैं 
विश्वास में घात समझ 
रहती तुम सूजी सूजी हो 
हाँ सुजो तुम दूजी हो   

शंका मन से निकालो  न ही मन में दुखी हो 
प्रथम प्रणय मेरा तुम, तुम ही मेरी दूजी हो  

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

धर्म ढूंढता

चर्च के बाहर पड़ा पालना
उसमे नवजात को डालना 
माँ है बाप है ये तो तय है
इसमें बदनामी का भय है
ये कर्म किस धर्म में आता है

अजान याद, तो है मुसल्लम 
जनेऊ धरे, तो वो पंडित सम,
वाहे गुरु, तो शबदों में पारंगत
बाइबल की सीख का ज्ञाता है
स्वयं से जूझता फिरूं मै पूछता 
ये कर्म किस धर्म में आता है


मस्जिद में वो अजान को तरसे 
मन्दिर में खड़ा प्रसाद को तरसे 
ग्रन्थि संग पर अरदास को तरसे 
जीजस की जला कर मोमबत्ती वो 
तरसे पूछता, जीवन जीने की चाह
ये कर्म किस धर्म में आता है


हे सूरज तुम कैसे अपना धर्म 
इन धर्मों संग चल निभाते हो 
जल चलते रहते हरपल कलकल
नैया धर्मो की अलग चलाते हो
प्रकृति का धर्मों से घर नाता है
ये कर्म किस धर्म में आता है

मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे
बनाये जिसने, गया हमें दे सारे
पीर  पुजारी, पादरी, ग्रंथि हमारे 
उसकी शक्ति तो सभी बतला रहे 
पाँच हैं छठी ना कोई बताता है
ये कर्म किस धर्म में आता है

पर करूं क्या, मै  यूँ खड़ा खड़ा
धर्म अपना ढूंढता, था पालने पड़ा
सर्व धर्म अपने लहू संग है दौड़ते
पूछता धर्म, क्यूँ मुख सभी मोड़ते 
किसने बनाए, बांटे धार्मिक धर्म    
ये कर्म धर्म, न कोई बताता है

दीवाना

कैसे तबाह करके, मुझे तुम चले गए 
एक झलक दिखा कर दीवाना कर गए

आज़ाद था घूमता दिल की लगी से दूर
दिल से दिल मिला कर दिवाला कर गए 

हमको था गरूर अपने दौलत ए दिल का 
लुट गये एक पल में,  सब कुछ लुटा गए

पर्दे में छुपा था यूँ, खुदा का तराशा नूर
झोंके से हवा के, हम खुद ही बिखर गए

बस्ती अपनी गुम थी, तन्हा पड़े थे हम
कदमो की आहट थी, तूफान गुजर गए

नजूमी ने कहा था, उम्र है बरसों बरस
रूह भटकती है यूँही, जीते जी मर गए 

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

ख़ुशी आई

गरीब के घर आज ख़ुशी आई 
बेटी के रूप में किलकारी पाई
तेरा कर्म सब पर बराबर होता 
पर मेरे नसीब में गरीबी आई 

चाहता हूँ न ये यौवन तक जाये 
सुन्दरता न सम्मुख कभी आये 
स्वप्नों की दुनिया में बस ये देखे 
भूख समर्पण पसीने में नहायी 

गरीब के घर आज ख़ुशी आई 

नही फटा ये वस्त्र कभी पहने 
कान न कभी सुने नाम गहने 
तितली न कभी सखी हो इसकी 
बस याद रहे ये है गरीब की जाई

गरीब के घर आज ख़ुशी आई 

देह की अग्नि से दूर ही रहे सदा 
श्रम अभाव लाचारी इसकी सम्पदा 
दुल्हन पालकी प्यार से न वास्ता 
खेले संग लिए घुटन और तन्हाई
गरीब के घर आज ख़ुशी आई 

रविवार, 10 अप्रैल 2011

शहर की छोरी

तुम ठहरी शहर की छोरी
मै खेड़े गाँव का बावला 
ये प्रेम क्यूँ कैसे हो गया 
मै मूढ़ फंसा अच्छा भला

तेरी सादगी मुझे है भाई 
छ्ल कपट की बू न पाई 
मै चाहूँ तुझे अपना पति
मुझे तू ही लगा सबसे भला

तेरी गोरी निखरी काया
यहाँ तगड़ी धूप का साया
तुझे दुखी दखने से पहले
ओ ऊपरवाले मुझे बुला

पिया जहाँ तू रहे मै रहूँ
तेरी सूखी में भी सुखी रहूँ
मेरा सोया भाग्य खुल जाये
जो लेलूं तेरी बुरी बला

अरी पगली जिद तू छोड़ दे
किसी शहरी से नाता जोड़ के
मुझ गरीब के पास न रहने को
नई चुनरी को नहीं एक धेला    

नही चुनरी तुझसे मांगू
ये शहरी रूप मै त्यागूँ
बस तुझ संग फेरे हो जाएँ
चाहे उसके बाद मर जाऊं

न ऐसे शब्द तू बोल
ले खड़ा मै बाहें खोल
आजा दोनों एक हो जाएँ
आई है मिलन की शुभ बेला