बुधवार, 26 जनवरी 2011

विचार

जब हम हम थे, तब गम ना थे
अब जब गम हैं, तब हम ना हैं

 

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

चाह

मानव जीवन चलता है
यात्रा धर्म में पलता है
बात जो समक्ष आती है
यात्रा नये वस्त्र पाती है
जीवन जिए वस्त्र लिए
नये, पर पुराने सभी हुए

मित्रो अंतिम यात्रा के लिए 
एक चाह में राजीव जिए
ढकने तन को ढूंड पुराना
नाप तन को तुम ले आना
यदि चढ़े कोई गर्म नया
उसे ठिठुरते को दे आना        

रविवार, 9 जनवरी 2011

सभ्य सभ्य

दादा नाना से सुनते थे
मानव मंडी में बिकते थे
नर देह की ताकत देख
नारी तन मादकता देख
हाथ लगा कर गर्मी ले  
बोलियाँ सेठ लगाते थे
चाह अनुरूप हर दास दासी
कैद हवेली पिंजरा पाते  थे
पशु योग्य के अनुरूप सारे
अपने सभी कार्य करते थे
पशु पैशाचिक जैसे काम
सब दास दासी ही पाते थे

समय बदला तब कानून बने
बोली लगे न कोई गुलाम बने
पर हर घर की है वही कहानी
नौकर हो घर की रीत पुरानी
नया रूप में मानव मंडी देखो
अब बंद होटलों में सजती हैं
खेलों में नाम शीर्ष पर मानव
अब बोली उनकी भी लगती है
क्या ये बिकते मानव तन सभी
अपना वो इतिहास दोहरातें हैं
जो खरीदे तन पहले करते थे
क्या वो पैशाचिक काम पातें हैं

नई सुबह बनते नए  कानून
सभी बस एक धोखा मात्र है
अतीत हमे  भीतर घेरे  ऐसा
रूप बदल कर समक्ष लातें  हैं
बिन झांके अपने अपने भीतर
सभ्य सभ्य का राग गातें हैं   

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

चल झाड़ हाथ

शिथिल शरीर
उखड्ती साँस
उचाट सा मन  
थकन अहसास
भारी से कदम  
बोझिल आत्मा

थकी सी पलक
पुतली कांपना
सांझ हो गई
घर को ताक
समय हुआ
चल झाड़ हाथ  

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

छाता है पाता है

आओ एक दुसाहस करे
लकीर का फकीर न बन
ढले सूरज को कर नमन
आओ पहले ये साहस करें

जिसने जल जल पुरे दिन
रास्ता साफ़ कर दिखाया
हमने उसे तनिक न कहा
उसने अपना कर्तव्य निभाया

उसकी निश्चितता तो देखो
बिन कहे रोज वो आता है
स्वार्थ भाव में सुबह पुजता
सांझ अकेला रह जाता है

एक सत्य है यही धरा का
जो छाता है पाता है सदा
ढले हुए या जर्जर हो पड़े
समय आए जाता है सदा

आओ ढले को भी अपनाएं
अहसानों को ना हम भुलाएँ
ढलना एक दिन सबको है
उदय और अस्त सबको है

आओ एक बार प्रयास करें
ढले भी पूजें ना उपहास करें
सृष्टि को हो गर्व पाल हमे
ऐसा पुत्र होने का साहस करें 

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

उड़ने वालों सुनो

आकाश पर उड़ने वालों सुनो
तुमेह  धरती का है ये कहना
ऊँचा उड़ो चाहे तुम नभ छुलो
पर धरती पर तुम्हे है रहना

नभ पाने के तुम स्वप्न लिए
जीवन का चौथा हिस्सा जिए
जो मिला था उसकी बेकद्री
राहें जो चुनी सारी दर्द भरी
बिन पंख तुने  उड़ना चाहा
कटा सा तू  धरा पर आया
इसलिए तो कहता हूँ ये मै
आकाश पर उड़ने वालों सुनो


जागे हो या तुम सोये हुए
स्वप्नों में रहे सदा खोये हुए
मर्ग वाली तर्ष्णा सम्भाली थी
सच वाली जगह सब खाली थी
मुट्ठी बंद पर क्या मांगते तुम
मुट्ठी खोलो तब तुम पाओगे
इसलिए तो कहता हूँ ये मै
आकाश पर उड़ने वालों सुनो


हर रिश्ता है तुमेह लुभाने को
जीवन में कुछ समय बिताने को
पड़ाव आते ही  उतरते जायेंगे
संग तेरे कभी भी ना आयेंगे
फिर क्यूँ तू उड़ता रहता है
क्यूँ सच को ना तू सहता है
इसलिए तो कहता हूँ ये मै
आकाश पर उड़ने वालों सुनो

आकाश धरा का प्रेम है ये
वो देता धरा को जीवन भर
तू देख वो दोनों दूर सदा
रहते संग ज्यूँ ना हो जुदा
जो छोड़ धरा को नभ को चला
नभ ने उसे धरती पर ही मला     
इसलिए तो कहता हूँ ये मै
आकाश पर उड़ने वालों सुनो

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

भूख

उसको जो लगी भूख तो वो काम को चला गया
मुझको जो लगी भूख तो मै व्योम में समा गया

क्या उसकी भूख और मेरी भूख दोनों में अंतर है
या उसकी भूख और मेरी भूख दोनों समानांतर है

पेट और पेट तले की भूख संग जो चला चला गया
भूख जो उपर हो पेट से तृप्त, मुक्त हो चला गया

भूख की भूख भक्षक बनी जग उसी में निगला गया         
सिर्फ यही सोच को लिए मै भीतर ही विचला गया

उसको जो लगी भूख तो वो काम को चला गया
मुझको जो लगी भूख तो मै व्योम में समा गया