शनिवार, 18 दिसंबर 2010

माटी मिला

दुनिया से कूच की चाह ने उनके हाथ को होठों पर ला दिया
प्यार जिन होठों से निकलना चाहता था उनपर जमा गया
वाह बनाने वाले तुने किस मिटटी से बना कर सजाया इसे
ना जीता है माटी मिला और ना मरने पर माटी मिलता है  

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

ना चाहूँ

अब और ना चाहूँ मै तुझसे
जो दिया मै उसे सम्भाले हूँ

नन्हे हाथों संग खेल कूद 
घुटनों चलता माटी मलता 
अपने इन पैरों के होते भी
बचपन में चल ना पाता था
तब तू ही रूप बदल आया 
तुने माँ बन मुझे चलाया था
अब तू ही बता मै क्या चाहूँ............

कैसे दुनिया में जीवन जियें
पग पग पर ठोकर ना खाएं
तुने हर बात का ध्यान धरा
हमे कभी कोई दुःख ना पायें
हर पग पर तू था संग मेरे
तुने पिता का रूप संभाला था
अब तू ही बता मै क्या चाहूँ ...........

किससे कैसे हम बात करें
हम बड़ों को कैसे माथ धरें
स्वभाव हमारा हो कैसा
जग में हम कैसे नाम करें
हमे उस सांचे में ढालने को
तुने गुरु का रूप संभाला था
अब तू ही बता मै क्या चाहूँ..............

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

शान्ति

मन क्यों उदास है
ऐसा क्या पाया उसने
जो ना मेरे पास है

विलासता मेरे सम्मुख
धन भरा अपरम्पार है
आम सोच से परे
फैला ये व्यापार है

ढूँढता फिरे मन और किसे
घूम घूम आ मस्तक घिसे

वो कहे सब है पर वो नही
बिना पाए जीवन निराश है

इस पहेली से फिरा मै जूझता
रहा एकांकी मै सभी से पूछता
पूर्ण सुख, क्या ना मेरे पास है
सच है मुझे शान्ति की तलाश है

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

चेतना

वेदना की चेतना को भेदना
लक्ष्य है जियूं बिन संवेदना
रिश्तों की लम्बी लड़ी संग
जीवन पर हो कभी खेदना
पास रहूँ पर कुछ तो दुरी हो
दूसरों का कांधा ना धुरी हो
सागर संग पांवू गहराइयाँ
जहाँ छपूँ वहां चाहूँ हो रेतना
कोमल हो वाणी इस ह्रदय से
जो बांधे समस्त जग को कसे
एक जग साथ पग मिलके बढ़ें
चाहूँ यही सूत्र करे कभी भेदना                    
 
 

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

इश्के दरिया

प्याला भरा है  सामने, यारों आओ अंजाम दो
राजीव इश्के दरिया ये चूमो डुबो और जान दो

वो जिनसे सब मिलने को तरसते हैं
हम हैं जो उनकी आँखों में बसते हैं

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

प्रकृति बचाओ

निहार सुन्दरता धरा की
सपनो का तानाबाना बुना 
रंग हरा संजोयें हम कैसे 
ना ही कोई माध्यम चुना
पर्वतों  की रक्षक श्रंखलायें 
लुप्त हो धरा को नग्न कर
हमे हर पल चेताएँ जा रही
बस बहुत हुआ अब बस कर
क्यूँ दे घाव धरती का सीना 
मातृत्व को तू लज्जाता है  
तेरे अपने आयें पायेंगे क्या  
सोच क्यूँ तू व्यर्थ गवांता है
जल को जला रसायन बना  
कब तक तू उपर उड़ा पाएगा        
बादल जो जल भर लाते हैं  
उनको भी वंचित करवाएगा 
बिन भेदभाव जो वो बरसाते    
उनमे क्या स्वार्थ जगायेगा 
जंगल सागर कुएं की गागर 
सब कुछ तू यूँ ही गँवाएगा 
प्राकृतिक जो तू मुफ्त पाता 
कृत्रिम कर दे जग जायेगा 
राजीव संभल कर चल प्यारे    
अन्यथा करनी को पछतायेगा  

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

ओशो

ओशो बस एक नाम नहीं 
उस नाम मे छिपा धाम है 
मुक्ति का एक मार्ग है वो
मद मस्त जीवन जाम है