रविवार, 29 जनवरी 2012

मंजिल है दूर

पथ पर निकला एकांकी संग ले चला बीती झांकी
जब थकन एहसास हुई तुम तभी से मेरे साथ हुई
उस क्षण जो तुमने बोला कानो में था मिश्री घोला
थकन गई किस राह निकल पता चला नही बोला
हर पथ पर मिलनेवाला मेरी ओर देखता तुम पर
तुम बस एक मुस्कान फैला हर लेती गुमसुम पर

हर राहगीर न पाता होगा हमसफर जो हो तुम सा
तभी तो मंजिल दूर लगे उन्हें जिसे पा लें  हम सा
ये जीवन की लहरें हैं उठा पटक ले झपट हमे चलें
जो न हो हमसफर तुमसा मंजिल है दूर अभी खले
अरे पथिक सम्भल पहुंच कर मंजिल के तू निकट
रेतीली भ्रांतियां कर रही राजीव का पथ और विकट

4 टिप्‍पणियां:

Fun and Learns ने कहा…

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Shah Nawaz ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन पर की है मैंने अपनी पहली ब्लॉग चर्चा, इसमें आपकी पोस्ट भी सम्मिलित की गई है. आपसे मेरे इस पहले प्रयास की समीक्षा का अनुरोध है.

स्वास्थ्य पर आधारित मेरा पहला ब्लॉग बुलेटिन - शाहनवाज़

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत खूब ... सुन्दर कविता है ... भाव मय ...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अभी बहुत चलना है साथी, अभी बहुत चलना है..