रविवार, 29 जनवरी 2012

मंजिल है दूर

पथ पर निकला एकांकी संग ले चला बीती झांकी
जब थकन एहसास हुई तुम तभी से मेरे साथ हुई
उस क्षण जो तुमने बोला कानो में था मिश्री घोला
थकन गई किस राह निकल पता चला नही बोला
हर पथ पर मिलनेवाला मेरी ओर देखता तुम पर
तुम बस एक मुस्कान फैला हर लेती गुमसुम पर

हर राहगीर न पाता होगा हमसफर जो हो तुम सा
तभी तो मंजिल दूर लगे उन्हें जिसे पा लें  हम सा
ये जीवन की लहरें हैं उठा पटक ले झपट हमे चलें
जो न हो हमसफर तुमसा मंजिल है दूर अभी खले
अरे पथिक सम्भल पहुंच कर मंजिल के तू निकट
रेतीली भ्रांतियां कर रही राजीव का पथ और विकट
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