सोमवार, 23 जनवरी 2012

कुर्सी

जब आम आदमी था मै  
सब मेरे मै सबका था
याद मुझे वो दिन आता 
कुर्सी पाने मै लपका था   

जब से कुर्सी चाही मैंने  
बस कुर्सी ही चिपक गई 
सीढ़ी जो उपर ही लाती
चढ़ते ही वो खिसक गई 

अब न मुझको तुम दीखते 
न मुझ तक पहुंचें आवाजें 
कुर्सी वालों की दुनिया मै 
जनता के हैं बंद दरवाजे

कुर्सी की चाहत में जीना
कुर्सी की चाहत में मरना
कुर्सी पाने की चाहत में
दंगे, संग गाली और धरना
     
कुर्सी वालों की दुनिया में
अपने पराये का भेद कहाँ
नेकी से न कोई वास्ता
पर करते नेकी नेक यहाँ

साहूकारों की खिलती बांछे
जिनका मुझ पर दावँ लगा 
मेरी जीत में जीते हैं वो
आते पाते जाते आस जगा

जिनसे नफरत सदा रही 
वो द्वार बंधे यमदूतों से
कब किसकी आई लें चलें
हम जियें मरें यूँ भूतों से

राजीव क्यूँ चाहे कुछ करना
जब भरने का अवसर आया
तकदीर ने खोले सब ताले
भर,खाली बोरे,माणिक माया

2 टिप्‍पणियां:

Pallavi saxena ने कहा…

सरथक प्रस्तुति ...समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्त पर अपप्का स्वागत है

Personal Loan ने कहा…

Really very niceeeeee