बुधवार, 13 जुलाई 2011

चित्कार

चहुँ ओर भीड़ का सन्नाटा
अंदर क्यूँ चले चीख पुकार
जग खड़ा पर चुप्पी साधे  
ना सुनता मन की चित्कार 
असमंजस तन मन देखे  
किसे सुनाए भीतरी गुहार
चला  लिए चाह कांधे की
भिगो जिसे निकले गुबार
सोच तुमेह हम ज्यूँ आए
तुम स्वयं कर रहे पुकार
अपना मन अपनी शांति
खोज करूँ होवे छुटकार

2 टिप्‍पणियां:

Sunil Kumar ने कहा…

जब मन की शांति मिल जायगी तब सब दुख दूर हो जायेंगे

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन को चाहिये, नीरवता का विस्तार।