शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

इंतजार था तुम्हारा


बीमार का हाल पुछने दुनिया आई 
पर आँखों को इंतजार था तुम्हारा 
खुदा से दुआ मांगते है वो नहीं आयें 
उनके माथे की शिकन न देखी जयेगी 
हम खुद ब खुद मर मर कर जीलेंगे
सारे दर्द हम अपने में समेट यूँ लेंगे 
जनाजा भी अपना दर्द भी अपना 
बस दीदार ए यार आँख खुली पायेंगे


अपना मोती


मौज नहीं चाहिये मैं साहिल चाहता हूँ
खुशीय़ां ज़िंदगी मे षमिल चाहता हूं
बुंद हुं सागर की सीप की टलाश में 
चोला बदल अपना मोती चाहता हूं

आया नया सवेरा


चलो देखें नया  सवेरा आया
कुछ बदलाव लाया
धन मन और प्रेम का
क्या कुछ नया भाव आया
वाह धन चोटी पर
मन खूंटी पर
प्रेम का शेयर आज भी नहीं खुल पाया

सोचता हूँ


सोचता हूँ
क्या सोचता हूँ मैं
क्या सिर्फ सोचकर
सोचता हूँ मैं
सोचता हूँ
क्यूँ सोचता हूँ मैं

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

जय भारती

जय भारती जय भारती जय भारती जय भारती
२६ जनवरी राजपथ को रंगों से है संवारती

२६ जन को हमने अपना, संविधान लागू किया
रौशनी चमकी यहाँ, हमने जलाया, अपना दीया  
पगपग बढ़ते रुकते ना हम, मना रहे गणतंत्र है
दुनिया में हमसे बड़ा न, कोई और जनतंत्र है
बार बार जन्मे यहाँ हम, पावन धरा पुचकारती

जय भारती जय भारती जय भारती जय भारती

लोगों की, द्वारा, के लिये लोकमत सरकार है
भिन्न भिन्न धर्मों के देखो, मिलेजुले त्यौहार है 
सोंधी माटी हिन्द की देखो, वीरो से पंचतंत्र है
दूश्मन को घर घुस के मारे, रचता जो षड्यंत्र है
वीरों की धरती है यह वीरों की है भारती

जय भारती जय भारती जय भारती जय भारती

लाठी और लंगोटी वाला, राष्ट्रपिता कहलाता है  
आज लाल लंगोटी वाला, हर रोग दूर भगाता है
चाय पिलाने वाला, राजपथ की शान बढ़ाता है
थरथराय भ्रष्टाचारी, ऐसे उपाय बताता है
कुद्रष्टि जो डाले ईस पर, मृत्यु उसे पुकारती

जय भारती जय भारती जय भारती जय भारती

है कोई ऐसा देश जहाँ धरने वाला मुखिया हो
मुद्रा पल में रूप बदले, हसें सभी, पर दुखिया हो
आओ कण कण उसका पूजें भवसागर से तारती
पत्थर पूजें नदियाँ पूजे सुबह शाम हो आरती
हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई सबकी रग पुकारती  


जय भारती जय भारती जय भारती जय भारती

सोमवार, 14 नवंबर 2016

माँ

जो चाहा था वो पाया था
मेरे सर माँ का साया था

मै जब किसी शुभ कार्य हेतु घर से जाता था
माँ का हाथ बिन भूले दही शक्कर खिलाता था

आज मेरी गलतिओं पर कोई, डाँटने वाला नहीं है
पर गलती नहीं करता क्योंकी माँ अब भी यहीं है

जब भी नाकामी का अहसास होता है
माँ के आँचल का सर पर आभास होता है

भगवान् क्षमा मांगता हूँ
आज भी तेरा दिया जला नही पाया
माँ को तो तूने बुला लिया

पर मै उसे अब भी भुला नही पाया

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

पग कहाँ धरें

आने पर ना बस था कोई
तब जाने की क्या बात करें
तू है मेरी कथन यह तेरा
है धरा कहाँ पग कहाँ धरें

जहाँ भी जाते इस जहान में
कण रण क्षण सब उसका है
कहते हैं हम धरा के प्राणी
पर तन मन धन उसका है
यह तू बता हम कहाँ मरें
है धरा कहाँ पग कहाँ धरें

आयें है तो पायेंगे क्या
खेत तेरा खलियान तेरा
लगा हँगा गंजे धर कंघा
रीती झोली, हम कहाँ भरें
माटी माँ अब बुला रही, पर     

है धरा कहाँ पग कहाँ धरें