गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

बदबू

कल मैंने एक सपना देखा
जी हाँ मैंने सपना देखा

सपना कुछ अपना सा ना था
सपने ने सुख चैन छीना था

रह रह कर बदबू आती थी
नाक स्थान छोड़ना चाहती थी

उठा छोड़ अपनी चारपाई
खोजने बदबू कहाँ से आई

बदबू घराना जे जे बस्ती
गरीबी यूँ रहना हक समझती

ना बदबू वहाँ न हीं जात भाई
भौच्चकी आँखे इतनी सफाई

चकाचौंध चमके थी बस्ती
लगा रहे भगवान सी हस्ती 

सोचने को मजबूर हुआ
पर बदबू से ना दूर हुआ

नाक जिधर सड़ सड़ती थी
चाल उधर पग पग बढ़ती थी

आलिशान मकानों की बस्ती
पर बदबू से नाक और कसती

भीतर जायूं औकात नहीं
बदबू सहूँ कोई सौगात नही

इधर उधर देख पाया झरोखा
झाँका घबराया सोचा सच या धोखा

अर्धनग्न नर नारी
सभ्यता का माखौल बनाते
पाश्चात्य संगीत, एक हाथ गिलास
दूजे से कमर पकड़ मटकाते
आधे मुर्दा से झूम रहे हैं
पास रेंगते दिमागी कीड़े
दिमाग खराब कर चूम रहे हैं

कुछ लोगों को शक हुआ
मेरा डर से चेहरा भक हुआ

तभी हट्टे कट्टे मेरी ओर आकर
खड़े हो गये मुझे घेरे
हडकाते धमकाते कौन हूँ मै
पूछे कहाँ उनके राज हैं बिखेरे

जनाब मजबूर बदबू सूंघता यहाँ आया
पर महफ़िल और बदबू समझ ना पाया

बोला हमारे देश में यही तो हंसी की बात है
बदबू कहीं झाडे कहीं वाह क्या बात है

बरसों से भयानक बदबू के कीटाणु
हमारे पास कैद उन्हें कुछ होश कहाँ
जिन्हें तुम हो जो रोज झाड़ते झड्वाते
उनका न कोई कसूर नही कोई दोष कहाँ

मुझको तो दिखाओ मै हूँ आपका बंदी
भागूँगा नही मुझे घेरे आपके मुष्टंडे मुष्टंडी

बोले, देख हर कमरे में क्या क्या समाया है
बदबू किस की हर ओर जो तू देखने आया है

अराजकता, काला बाजारी, नकली दवाई है सारी
व्यभिचारी, भ्रष्टाचारी, मौत से है अपनी यारी
जितनी बदबू सब हमारी, बड़ी से बड़ी चोरियां सारी
अस्मत लूटें, हिंद को लूटें, लूटें यहाँ की सभ्यता सारी

तुम झाड़ो उठाये झाड़ू बिन जाने बदबू कहाँ से आ रही
जब भी तुम्हे पास पायें फैलायें ये महामारी, ये महामारी

मै घबराया जोश जगाया
छुड़ा कर भागा और चिलाया
हमे झाड़ू नही हथियार दो
बदबू मत झाड़ो मार दो

तभी मेरी माँ ने झकझोरा
दिन चढ़े क्यों चिल्लाता है
मैंने माँ को देखा और देखता रहा

कैसे कहूँ रात में भी सफाई करता रहा 
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