रविवार, 25 जुलाई 2010

कवि कौन

भावनाओ को पिरो लता हूँ
इसलिए मै कवि  कहलाता हूँ
मंच पर जब बैठता

सुनने सुनाने यदा कदा
महान काव्य सागर में
स्वयं को अधूरा पाता हूँ


रस पढ़े छंद पढ़े
गद्य पद्य के द्वन्द पढ़े
लय में लिखूं सदा
मात्राओं का ज्ञान लिया
लिखने बैठूं उससे पहले
विषय को पूरा जान लिया


पर काव्य सागर में मैंने
ज्यूँ ही एक गोता लगया
अपने आप को अलग थलग
एक अजब संसार पाया
जो छपता है वो सुनता नहीं
जो सुनता हूँ वो दीखता नहीं
जो पसंद है वो कहीं कहीं
प्रकाशक की पसंद सही


एक प्रशन मुझमे उमड़ रहा
असहनीय न जाये सहा
क्या कवियों की कतार में
वही कवि कहलाता है
जो जीवन जीता कुछ अलग
और कुछ अलग लिख पाता है


क्या दोहरा जीवन जीने वाला
काव्य सही रच पाता है
आँख और ह्रदय मूँद कर
जीवन समझ वो पाता है
मै जो सहता हूँ वो लिखता हूँ
इसलिए नहीं मै चल पाता हूँ

पर जैसे तैसे जोड़कर
लिखता हूँ और सुनाता हूँ
और बिना छपे किसी वरके पर
मै भी कवि कहलाता हूँ
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