शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

जीवन मंजिल जोहता है

जब तारे न थमते नभ में न लौ सूरज की फीकी हो
तू थक कर क्यों बैठ गया ज्यूँ मंजिल तेरी रीती हो

यहाँ पथ पर चलने वाला, हर कोई मुसाफिर होता है
तू निराला मत बन यहाँ, ये जीवन मंजिल जोहता है

मंजिल सबकी अलग अलग, साथी की तू बाट न जोह
वो जायेगा अपने पथ तू लेता फिरता उसकी क्यूँ तोह

पवन चले तू चलता चल जल बरसे तू सोच ना पल
दिन ढले या साया छले, तू मंजिल को बढ़ता चल

यहाँ दिखा तू थका थका, सब मुख मोड चले जायेंगे
सब होंगे पर थके को एकांकी का अहसास करायेंगे

उस पल को आने न दे जिस पल न कोई प्रीती हो
चल अब थक कर तू बैठ न, ज्यूँ मंजिल तेरी रीती हो

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