रविवार, 13 फ़रवरी 2011

प्रेम

तुम हो मेरी सेज संगनी
तुम ही मेरी प्रिय संगनी

तुम को देख प्रेम उपजा
प्रेम नदी का प्यासा हूँ मै
तुम वो प्यास बुझाने आई
बन कर तुम मेरी अर्धांग्नी

रूप तुम्हारा नैनो में बसता
होंठ हैं सूखे देखें वो रासता
डर ह्रदय में एक ही बसता
बढ़ ना जाये प्रेम की अग्नि

जितना चाहा प्रेम घटाना
उतना इसकी लौ बढ़ जाये
दीप के पास भंवरा मंडराए
जला उसे पछताए अग्नि

जग में मुझे कुछ ना भाए
बंद नैन तुम्हे खो ना जाये
डर कर जीता जाता हूँ मै
प्राण छुटे पर ना छुटे संगनी

तुम हो मेरी सेज संगनी
तुम ही मेरी प्रिय संगनी
 

   
         
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